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सेवा से बढ़कर कोई साधना नहीं है

सेवा के द्वारा तुम्हारा हृदय शुद्ध होता है। अहंभाव, घृणा, ईर्ष्या, उच्चता की भावना और इसी प्रकार की सारी कुत्सित भावनाओं का नाश होता है तथा नम्रता, शुद्ध प्रेम, सहानुभूति, सहिष्णुता और दया जैसे गुणों का विकास होता है। सेवा से स्वार्थ-भावना मिटती है, द्वैत भावना क्षीण होती है, जीवन के प्रति दृष्टिकोण विशाल और उदार बनता है। एकता का भान होने लगता है, आत्मज्ञान में गति होने लगती है। ‘एक में सब, सब में एक’ की अनुभूति होने लगती है। तभी असीम सुख प्राप्त होता है।

“वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से
ओतप्रोत हृदय

पिछले 60 से अधिक वर्षों से सनातन वैदिक संस्कृति का शंखनाद करने के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण, व्यक्ति निर्माण व सामाजिक मूल्यों द्वारा समाज-निर्माण में सेवारत रहे हैं संत श्री आशारामजी बापू ।

विश्व धर्म संसद, शिकागो

हिन्दू संस्कृति का परचम लहराने पार्लियामेंट ऑफ वर्ल्ड रिलीजन्स (विश्व धर्म संसद), शिकागो में भारत का नेतृत्व 11 सितम्बर 1893 को स्वामी विवेकानंदजी ने और ठीक उसके 100 साल बाद 4 सितम्बर 1993 को संत श्री आशारामजी बापू ने किया था ।

गौ रक्षण व संवर्धन

60 से अधिक छोटी एवं बड़ी गौशालाओं द्वारा 10, 000 से अधिक क़त्लखाने ले जाने से बचायी गई गायों एवं गाय की देशी नस्लों का रक्षण व पालन-पोषण होता है ।

पर्यावरण सुरक्षा अभियान

पूज्य बापूजी कहते हैं : “अपने घरों, इलाकों में तुलसी, आँवला, पीपल, नीम और बरगद के वृक्ष लगें ऐसा प्रयत्न सभीको करना चाहिए । इनमें पीपल , आँवला व तुलसी अति हितकारी हैं । पीपल लगाने की आप वन विभाग को सलाह देना, उत्साह देना तो मैं समझूंगा आपने भगवान की भी सेवा की, समाज की भी सेवा की और मेरे पर बड़ा एहसान किया ।”

बाल संस्कार केंद्र, विद्यार्थी शिविर, योग व
उच्च संस्कार कार्यक्रम

बापूजी की प्रेरणा से बच्चों में सुसंस्कार सिंचन हेतु देशभर में हजारों बाल संस्कार केंद्र नि:शुल्क चलाये जाते हैं, साथ ही विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए वर्षभर में सैंकड़ों विद्यार्थी शिविरों एवं हजारों योग व उच्च संस्कार शिक्षा कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है । इनमें हजारों-हजारों विद्यार्थी हिस्सा लेकर उन्नत होते हैं ।

नारी सशक्तीकरण महिला उत्थान मंडल

नारियों को पाश्चात्य कल्चर के अंधानुकरण से हो रही हानियों से बचाने तथा महिला-उत्थान, पारिवारिक सौहार्द व समाजोन्नति के सेवाकार्यों को और भी व्यापक बनाने हेतु महिला उत्थान मंडल का गठन हुआ, जो निरंतर बापूजी से मार्गदर्शन एवं प्रेरणा पाकर महिलाओं के सर्वांगीण विकास हेतु कार्यरत है ।

वैदिक और आधुनिक शिक्षा एक साथ

लुप्त होती जा रही अपनी वैदिक परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए बापूजी ने अनेक गुरुकुलों की स्थापना की । देशभर में चल रहे गुरुकुलों में पढनेवाले विद्यार्थी उत्कृष्ट -परिणाम लाने के साथ-साथ विज्ञान, योग, खेल, संगीत आदि क्षेत्रों में भी अनेक राज्य व राष्ट्र स्तरीय पुरस्कार प्राप्त कर रहे हैं ।

दरिद्रनारायणों की सेवा ‘भजन करो, भोजन
करो, दक्षिणा पाओ’ योजना

धर्मांतरण के केन्द्रबिंदु आदिवासी, वनवासी, अभावग्रस्त इलाकों में आश्रम द्वारा गरीबों, अनाश्रितों एवं विधवाओं को राशन कार्ड दिये गये हैं । इनके माध्यम से उन्हें हर माह अनाज व जीवनोपयोगी वस्तुएँ निःशुल्क प्राप्त होती हैं । ‘भजन करो, भोजन करो, दक्षिणा पाओ’ योजना के तहत प्रतिदिन भगवन्नाम-जप, सत्संग, कीर्तन करवाकर भोजन एवं 50 से 70 रुपये तक की नकद राशि दी जाती है ।